दरभंगा। International Museum Day: धरोहरों को संरक्षित करने में मिथिलांचल का इतिहास समृद्ध है। दरभंगा महाराज ने तो टाइगर आफ मैसूर (टीपू सुल्तान) की धरोहर को भी संरक्षित किया है।
लंदन के बोनहम्स में 1889 में टीपू सुल्तान की धरोहरों को नीलाम किया गया, तो उसमें दरभंगा महाराज ने देश की शान को रखने के लिए भाग लिया था।
महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह ने सबसे अधिक बोली लगाकर कई धरोहरों को दूसरे देश में जाने से रोक लिया था। इनमें हाथी दांत की कलाकृतियां अद्भुत हैं। इन्हें देखने के लिए बाहर से भी लोग आते हैं।
दरभंगा महाराज की अपनी धरोहरों के साथ-साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कलाकृतियों को 16 सितंबर, 1979 में स्थापित महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय में प्रदर्शित किया जा रहा है।
यहां हाथी दांत से बने राजसिंहासन, महिषासुरमर्दिनी, हौदा, पलंग, पालकी, कुर्सी, अलमारी, बक्सा, नगारा, सोफा सेट आदि लोगों को आकर्षित करते हैं।
ऐसे तो हाथी दांत की कलाकारी देश के कई संग्रहालयों में है, लेकिन दरभंगा में इसके जितने संग्रह हैं, उतना किसी जगह नहीं है। इन संग्रहों में कुछ टीपू सुल्तान के हैं, तो अधिकांश दरभंगा महाराजाधिराज के स्वयं के।
विक्टोरिया मेमोरियल कोलकाता को दान में दे दी गईं तीन कुर्सियां
इतिहासकार रमण दत्त झा और दरभंगा राज धरोहर के जानकार कुमुद सिंह का कहना है कि दरभंगा महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह ने सबसे अधिक बोली लगाकर हाथी के दांत से बनी कई धरोहरों को दूसरे देश जाने से रोक लिया था।
इनमें तीन कुर्सियां विक्टोरिया मेमोरियल कोलकाता को दान में दे दी गईं। शेष कुर्सियां, हौदा, नगारा दरभंगा राजमहलों की शान बन गए। इन्हें बाद में संग्रहालय को सौंप दिया गया।उधर, पुरातत्वविद शिव कुमार मिश्रा का कहना है कि दरभंगा महाराज ने मुर्शिदाबाद के कलाकारों को बुलवाकर हाथी दांत की कई सामग्री बनाई थी। ये महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय में संरक्षित हैं। इनपर उकेरी गईं कलाकृतियां और प्रतिमाएं आज भी चमक बिखेर रही हैं।