आयरन लेडी: इंदिरा गांधी आधुनिक विश्व इतिहास के सबसे शक्तिशाली, प्रभावशाली और विवादास्पद चेहरों में से एक हैं। भारत की पहली और अब तक की एकमात्र महिला प्रधानमंत्री के रूप में, उन्होंने देश के राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया। अपने दृढ़ संकल्प के कारण “आयरन लेडी” (लौह महिला) के नाम से जानी जाने वाली इंदिरा गांधी की विरासत आज भी सामाजिक सुधारों और अधिनायकवादी (authoritarian) फैसलों के एक अनोखे मिश्रण के रूप में देखी जाती है।
‘गूंगी गुड़िया’ से पार्टी की कमान तक
19 नवंबर 1917 को भारत के सबसे प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवार में जन्मी इंदिरा नेहरू का बचपन देश के स्वतंत्रता संग्राम के बीच बीता। उन्होंने अपने पिता और भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ रहकर वैश्विक कूटनीति और घरेलू शासन की बारीकियों को बहुत करीब से सीखा।
1964 में नेहरू जी के निधन और 1966 में लाल बहादुर शास्त्री की अचानक मृत्यु के बाद, कांग्रेस पार्टी के दिग्गज नेताओं के एक समूह (जिसे ‘सिंडिकेट’ कहा जाता था) ने इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद के लिए चुना। उन नेताओं को लगता था कि इंदिरा को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है—यहाँ तक कि विरोधी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने शुरुआत में उन्हें “गूंगी गुड़िया” तक कह दिया था।
लेकिन इन दिग्गजों ने इंदिरा गांधी की राजनीतिक समझ को कम करके आंका था। 1969 तक आते-आते इंदिरा ने पार्टी के पुराने नेताओं को सीधी चुनौती दी, कांग्रेस पार्टी का विभाजन किया और पूरी सत्ता अपने हाथों में केंद्रित कर ली।
लोकप्रियता का शिखर: ‘गरीबी हटाओ’ और 1971 का युद्ध
1970 के दशक की शुरुआत में इंदिरा गांधी का राजनीतिक करियर अपने चरम पर था। उन्होंने समाजवादी नीतियों और साहसिक विदेश नीति के दम पर जनता के दिलों में अपनी जगह बनाई।
- समाजवादी सुधार: गरीबों और श्रमिक वर्ग का भरोसा जीतने के लिए उन्होंने 14 प्रमुख निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और पूर्व राजा-महाराजाओं को मिलने वाले ‘प्रिवी पर्स’ (शाही भत्ते) को समाप्त कर दिया।
- 1971 का चुनाव: उन्होंने “गरीबी हटाओ” का ऐतिहासिक नारा दिया, जिसने देश के ग्रामीण और पिछड़े वर्ग को उनसे जोड़ दिया। इस चुनाव में उन्होंने भारी बहुमत से जीत हासिल की।
- बांग्लादेश का उदय: इसी साल (1971) पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में उन्होंने अमेरिका और चीन जैसे वैश्विक महाशक्तियों के दबाव के आगे झुकने से इनकार कर दिया। उनके नेतृत्व में भारतीय सेना ने पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी, जिससे दुनिया के नक्शे पर एक नए देश ‘बांग्लादेश’ का जन्म हुआ। इस जीत ने उन्हें देश के भीतर एक ‘अजेय दुर्गा’ के रूप में स्थापित कर दिया।
भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय: 1975 का आपातकाल
जीत का यह सिलसिला ज्यादा लंबा नहीं चला। 1970 के दशक के मध्य तक भारत आर्थिक मंदी, महंगाई और देशव्यापी हड़तालों से घिर गया। इस बीच जून 1975 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी को 1971 के चुनाव में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का दोषी पाया और उनके सांसद पद को अवैध घोषित कर दिया।
विपक्ष के भारी विरोध के बावजूद इस्तीफा देने के बजाय, इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 की रात को देश में आंतरिक आपातकाल (Emergency) की घोषणा कर दी।
इस 21 महीने के काले दौर में:
- नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए।
- जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी सहित 1 लाख से अधिक विपक्षी नेताओं और पत्रकारों को बिना ट्रायल जेल में डाल दिया गया।
- प्रेस पर कड़ा प्रतिबंध (सेंसरशिप) लगा दिया गया।
- इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी के नेतृत्व में चलाए गए जबरन नसबंदी जैसे कार्यक्रमों ने जनता को सरकार के खिलाफ कर दिया।
हार, शानदार वापसी और एक दुखद अंत
जब 1977 में आपातकाल हटा और चुनाव हुए, तो भारतीय जनता ने इंदिरा गांधी को सत्ता से बेदखल कर दिया। खुद इंदिरा गांधी भी अपनी सीट हार गईं। हालांकि, विपक्ष की ‘जनता पार्टी’ की सरकार आपसी मतभेदों के कारण तीन साल भी नहीं टिक सकी।
अपनी बेजोड़ राजनीतिक जीवटता का परिचय देते हुए इंदिरा गांधी ने विपक्ष की कमजोरी का फायदा उठाया। 1980 के आम चुनाव में उन्होंने ‘कांग्रेस (आई)’ के साथ एक बार फिर देश की राजनीति में ऐतिहासिक वापसी की और दोबारा प्रधानमंत्री बनीं।
उनका आखिरी कार्यकाल पंजाब में पैर पसार रहे सिख उग्रवाद की समस्या से जूझता रहा। जून 1984 में, उन्होंने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर से उग्रवादियों को बाहर निकालने के लिए सेना को ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ का आदेश दिया। इस सैन्य कार्रवाई में स्वर्ण मंदिर परिसर को भारी नुकसान पहुंचा, जिससे सिख समुदाय की भावनाएं काफी आहत हुईं।
नतीजतन, 31 अक्टूबर 1984 को उनके ही दो सिख अंगरक्षकों (बॉडीगार्ड्स) ने उनके आवास पर गोली मारकर उनकी हत्या कर दी।
एक जटिल राजनीतिक विरासत
इंदिरा गांधी का पूरा राजनीतिक जीवन विरोधाभासों से भरा रहा। उनके समर्थक उन्हें गरीबों का मसीहा, देश को अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बनाने वाली (हरित क्रांति की सूत्रधार) और भारत को परमाणु शक्ति संपन्न बनाने वाली एक मजबूत नेता मानते हैं। वहीं उनके आलोचक उन्हें लोकतंत्र को कमजोर करने वाली, तानाशाही रवैया अपनाने वाली और देश में वंशवाद की राजनीति को बढ़ावा देने वाली नेता के रूप में देखते हैं। वे चाहे जिस रूप में याद की जाएं, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आधुनिक भारत के इतिहास पर उनकी छाप अमिट है।