नारी शक्ति वंदन अधिनियम:किसी भी देश की प्रगति की कहानी उसके आधे हिस्से (आधी आबादी) की समान भागीदारी के बिना हमेशा अधूरी रहती है। भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में दशकों से देश की सर्वोच्च विधायी संस्थाओं (संसद और विधानसभाओं) में महिलाओं के प्रतिनिधित्व का मुद्दा सबसे अहम और लंबे समय से लंबित विषयों में से एक था। सितंबर 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम (संविधान का 128वां संशोधन विधेयक, 2023) के पारित होने के साथ ही इस परिदृश्य में एक युगांतरकारी बदलाव आया।
लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण को संवैधानिक मंजूरी देकर इस कानून ने केवल प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व से आगे बढ़कर निर्णय लेने की प्रक्रिया में लैंगिक समानता की शुरुआत की है। यह कानून ‘अमृत काल’ में नारी शक्ति से विकसित भारत के संकल्प को हकीकत में बदलने की दिशा में एक मजबूत कदम है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: दशकों लंबा संघर्ष
भारत में महिलाओं के लिए राजनीतिक आरक्षण हासिल करने का सफर लंबा, उतार-चढ़ाव भरा और संघर्षपूर्ण रहा है:
- स्थानीय शासन की नींव (1992): राजनीतिक क्षेत्र में महिला आरक्षण की शुरुआत 73वें और 74वें संविधान संशोधन अधिनियमों के माध्यम से हुई थी। इसके जरिए पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) और शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित की गईं। आज देश में 14 लाख से अधिक महिलाएं स्थानीय स्तर पर नेतृत्व कर रही हैं, और कई राज्यों ने इस कोटे को बढ़ाकर 50% तक कर दिया है।
- संसदीय गतिरोध (1996-2010): स्थानीय स्तर की इस सफलता को राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर लागू करना काफी चुनौतीपूर्ण साबित हुआ। महिला आरक्षण विधेयक को पहली बार 1996 में एच.डी. देवेगौड़ा सरकार द्वारा लोकसभा में पेश किया गया था। इसके बाद के दो दशकों में अलग-अलग सरकारों (1998, 1999 और 2008 में) द्वारा इस बिल को लाने के कई प्रयास किए गए। हालांकि 2010 में यह विधेयक राज्यसभा से पारित हो गया, लेकिन राजनीतिक आम सहमति की कमी के कारण यह हर बार लोकसभा में रद्द (Lapse) हो जाता था।
- 2023 की ऐतिहासिक सफलता: इस 27 साल पुराने विधायी गतिरोध को तोड़ते हुए, सितंबर 2023 में संसद के विशेष सत्र के दौरान इस विधेयक को पेश किया गया। यह अधिनियम संसद के दोनों सदनों में लगभग सर्वसम्मति से पारित हुआ, जो लैंगिक न्याय के प्रति सभी राजनीतिक दलों की परिपक्वता को दर्शाता है।
- नारी शक्ति वंदन अधिनियम भारतीय संविधान के ढांचे में कई महत्वपूर्ण सुधार करता है:
- नए अनुच्छेदों का समावेश: इस अधिनियम के माध्यम से संविधान में अनुच्छेद 330A (लोकसभा में आरक्षण) और अनुच्छेद 332A (राज्य विधानसभाओं में आरक्षण) जोड़े गए हैं। इसके साथ ही, अनुच्छेद 239AA में भी संशोधन किया गया है ताकि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की विधानसभा पर भी यह नियम लागू हो सके।
- 33 प्रतिशत कोटा: लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की कुल सीटों में से एक-तिहाई (33%) सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। यह क्षैतिज (Horizontal) आरक्षण होगा, जिसका अर्थ है कि यह अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए पहले से आरक्षित सीटों पर भी लागू होगा।
- सनसेट क्लॉज (समाप्ति अवधि): यह आरक्षण अधिनियम के लागू होने की तारीख से शुरुआती तौर पर 15 वर्षों की अवधि के लिए लागू किया गया है। संसद के पास कानूनी प्रक्रिया के जरिए इस अवधि को आगे बढ़ाने का अधिकार सुरक्षित है।
- सीटों का चक्रानुक्रम (Rotation): प्रत्येक परिसीमन (Delimitation) प्रक्रिया के बाद आरक्षित सीटों को चक्रानुक्रम (रोटेशन) पद्धति के अनुसार बदला जाएगा, ताकि राज्य और देश के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों की महिलाओं को प्रतिनिधित्व का मौका मिल सके।