यादव-मुस्लिम समीकरण से आगे बढ़ते हुए पासी, वाल्मीकि, शाक्य, मौर्य, कुर्मी, पाल और अन्य पिछड़ी जातियों के बीच अपनी सक्रियता बढ़ाई थी।
भाजपा ने मंत्रिमंडल विस्तार में इसी की काट तैयार करने की कोशिश की है। इसके लिए ही जाट, गुर्जर, पाल, लोध, विश्वकर्मा, पासी और वाल्मीकि जैसी जातियों को प्रतिनिधित्व दिया गया है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन्द्र सिंह चौधरी को फिर मंत्रिमंडल में शामिल करके पश्चिमी उत्तर प्रदेश और जाट राजनीति को साधा गया। सपा से बगावत करने वाले मनोज पांडेय को कैबिनेट मंत्री बनाकर पार्टी ने ब्राह्मणों की नाराजगी भी कम करने की कोशिश की है।राज्यमंत्री अजीत सिंह पाल व डा. सोमेंद्र तोमर को पदोन्नत कर पाल और गुर्जर समाज, जबकि कृष्णा पासवान, कैलाश सिंह राजपूत, सुरेंद्र दिलेर और हंसराज विश्वकर्मा को मंत्री बनाकर भाजपा ने दलित, लोध और विश्वकर्मा समाज में पैठ मजबूत करने की कोशिश की है। कृष्णा पासवान को मंत्री बनाना भाजपा की ‘महिला और दलित’ की रणनीति का हिस्सा तो है ही, इसी बहाने पासी समाज को बड़ा संदेश देने की भी कोशिश की गई। भाजपा अब प्रदेश संगठन के पुनर्गठन में भी जातीय क्षेत्रीय संतुलन साधते हुए उन प्रभावी जातियों को समायोजित करने की तैयारी में है जिन्हें मंत्रिमंडल में अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिल सका। रणनीति यही है कि संगठन से सरकार तक जातीय प्रतिनिधित्व की ऐसी ढाल तैयार हो सके, जिसे विपक्ष का कोई वार-प्रहार तोड़ न सके। विभागों के आवंटन में भी पिछड़ा सहित अन्य वर्गों के प्रमुख मंत्रियों को अहम विभाग देकर जातीय संतुलन के संदेश और गहरा करने की तैयारी है। हालांकि, इतने के बाद भी भाजपा के सामने चुनौतियां कम नहीं। राज्यों के चुनाव में भाजपा की हालिया सफलता के बाद सहयोगी दल फिलहाल दबाव की राजनीति से तो बचते दिख रहे हैं, लेकिन विस्तार के बाद भाजपा के अंदर उठे असंतोष के सुरों ने थोड़ी बेचैनी जरूर पैदा की है।
भाजपा की रणनीति समझकर विपक्ष भी अपनी सामाजिक गोलबंदी को और आक्रामक बनाने की तैयारी में है। सपा पहले से ही छोटे जातीय समूहों व संगठनों के नेताओं को अपने साथ जोड़ने के लिए उनके हिसाब से चुनावी घोषणाएं कर रही है। महापुरुषों की प्रतिमाओं की स्थापना से लेकर कल्याणकारी योजनाओं के वादे तक हो रहे हैं। सपा नेतृत्व का मानना है कि भाजपा भले ही प्रतिनिधित्व दे रही, लेकिन सामाजिक हिस्सेदारी और आर्थिक भागीदारी का सवाल अभी बड़ा मुद्दा बन सकता है। वहीं बसपा प्रमुख मायावती भी दलित वोट बैंक में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए गैर जाटव दलितों पर फोकस बढ़ा रही हैं। पार्टी बूथ स्तर पर पुराने संगठन को सक्रिय करने और दलित-पिछड़ा समीकरण को खड़ा करने की कोशिश में है, जबकि कांग्रेस सामाजिक न्याय, संविधान और आरक्षण जैसे मुद्दों को केंद्र में रखकर विपक्षी राजनीति में अपनी उपयोगिता बनाए रखना चाहती है।