मृत्यु भोज पर शोर, दहेज पर चुप्पी—यह कैसी सामाजिक प्राथमिकता?

बिहार के गांवों में जब किसी घर में मृत्यु होती है, तो शोक के साथ एक और चिंता शुरू हो जाती है—मृत्यु भोज कैसे होगा? कई गांवों में आज भी यह कहा जाता है कि “अगर भोज नहीं हुआ, तो समाज में बात बनेगी।” पर सवाल यह है कि क्या दुख की घड़ी में किसी गरीब परिवार पर यह दबाव जायज़ है? धार्मिक रूप से मृत्यु के बाद श्राद्ध, तर्पण, पिंड दान और दान-पुण्य का महत्व बताया गया है। गांवों में परंपरागत रूप से ब्राह्मण या जरूरतमंद को सादा भोजन कराया जाता रहा है। लेकिन समय के साथ यह परंपरा बदलकर पूरे गांव को दावत में बदल गई, जो कई परिवारों के लिए बोझ बन चुकी है। ग्रामीण बिहार में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जहां दिहाड़ी पर काम करने वाले परिवार ने: कर्ज लेकर मृत्यु भोज कराया गहना या पशु बेच दिया महीनों तक कर्ज चुकाने में जूझता रहा यह न धर्म है, न परंपरा—यह केवल सामाजिक दबाव है। यह बात साफ़ होनी चाहिए कि समस्या मृत्यु भोज नहीं, बल्कि उसे जरूरी बना देना है। अगर कोई परिवार अपनी मर्जी और हैसियत से सादा भोजन कराता है, तो यह उसका निजी निर्णय है। लेकिन कमजोर और गरीब परिवारों से यह उम्मीद करना कि वे सैकड़ों लोगों को खिलाएं, पूरी तरह अमानवीय है।

इसी समाज में एक और सच्चाई है, जिस पर उतनी तेज़ आवाज़ नहीं उठती—दहेज प्रथा। ग्रामीण इलाकों में आज भी बेटियों की शादी के लिए: जमीन गिरवी रखी जाती है सालों का कर्ज लिया जाता है “कम दहेज” के नाम पर लड़की को ताने और हिंसा झेलनी पड़ती है दहेज एक ऐसी बुराई है जो: हर शादी में आती है गरीब परिवारों को पूरी ज़िंदगी तोड़ देती है महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा दोनों को खत्म करती है इसके मुकाबले मृत्यु भोज एक बार की रस्म है, जबकि दहेज पीढ़ियों को प्रभावित करने वाला जुल्म है। यहीं समाज की प्राथमिकता पर सवाल उठता है। अगर सच में सुधार चाहिए, तो क्या फोकस मृत्यु भोज पर होना चाहिए, या उस दहेज प्रथा पर जो रोज़ घर-परिवार उजाड़ रही है? समाधान कठिन नहीं है। मृत्यु भोज को श्राद्ध, पिंड दान और गरीबों को भोजन तक सीमित रखा जाए किसी भी गरीब परिवार पर सामाजिक दबाव न डाला जाए और दहेज के खिलाफ गांव-समाज मिलकर खुली लड़ाई लड़े l

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