1980 का दशक भारत के लिए राजनीतिक बदलावों, वैश्विक तनाव और संवेदनशील रक्षा नीतियों का दौर था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री बने थे। भारत तकनीकी आधुनिकता और नई विदेश नीति की ओर बढ़ रहा था। लेकिन इसी दौर में देश की सत्ता के सबसे सुरक्षित गलियारों में एक ऐसा जासूसी कांड सामने आया जिसने पूरे राजनीतिक तंत्र को हिला दिया। यह मामला सिर्फ गोपनीय दस्तावेजों की चोरी का नहीं था, बल्कि इसने यह सवाल खड़ा कर दिया कि अगर प्रधानमंत्री कार्यालय तक में सेंध लग सकती है, तो देश की सुरक्षा कितनी मजबूत है। यह था — “कूमर नारायण स्पाई कांड”।
1985 में भारतीय खुफिया एजेंसियों को शक हुआ कि सरकार के अत्यंत गोपनीय दस्तावेज विदेशी ताकतों तक पहुंच रहे हैं। शुरुआत में यह संदेह सीमित था, लेकिन जांच आगे बढ़ी तो मामला बेहद गंभीर निकलकर सामने आया। जांच एजेंसियों ने पाया कि प्रधानमंत्री कार्यालय, रक्षा मंत्रालय और अन्य महत्वपूर्ण सरकारी विभागों की फाइलों की जानकारी बाहर भेजी जा रही थी। इन दस्तावेजों में रक्षा सौदों, विदेश नीति, कैबिनेट चर्चाओं और पंजाब-असम जैसे संवेदनशील मुद्दों से जुड़ी जानकारियां शामिल थीं।
इस पूरे नेटवर्क के केंद्र में एक कारोबारी था — कूमर नारायण। बाहर से वह एक सामान्य व्यवसायी दिखाई देता था, लेकिन जांच में सामने आया कि वह विदेशी एजेंसियों तक गोपनीय सूचनाएं पहुंचाने का माध्यम बन चुका था। कहा गया कि उसने सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के साथ संबंध बनाकर एक ऐसा नेटवर्क तैयार किया था जिसके जरिए गोपनीय दस्तावेज बाहर पहुंचते थे। कुछ सरकारी कर्मचारी फाइलों की कॉपी निकालकर उसे देते थे और बदले में उन्हें पैसे और अन्य सुविधाएं मिलती थीं।
जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, वैसे-वैसे इस कांड की पहुंच चौंकाने वाली लगने लगी। सबसे बड़ा झटका तब लगा जब यह पता चला कि प्रधानमंत्री कार्यालय में कार्यरत कुछ कर्मचारी भी इस मामले में संदिग्ध हैं। इससे प्रधानमंत्री कार्यालय की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठने लगे। हालांकि जांच में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी या उनके प्रधान सचिव पी.सी. एलेक्जेंडर के सीधे शामिल होने का कोई प्रमाण नहीं मिला, लेकिन उनके कार्यालय तक जासूसी नेटवर्क का पहुंच जाना अपने आप में बड़ा संकट था।
पी.सी. एलेक्जेंडर उस समय देश के सबसे प्रभावशाली नौकरशाहों में गिने जाते थे। वह राजीव गांधी के बेहद करीबी माने जाते थे और प्रधानमंत्री कार्यालय के संचालन में उनकी बड़ी भूमिका थी। जब उनके निजी स्टाफ के कुछ लोगों के नाम इस जासूसी कांड में सामने आए, तब राजनीतिक दबाव बढ़ने लगा। एलेक्जेंडर ने कहा कि भले ही वह सीधे तौर पर दोषी नहीं हैं, लेकिन यह सुरक्षा चूक उनके कार्यकाल में हुई है। इसी नैतिक जिम्मेदारी को स्वीकार करते हुए उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
उनका इस्तीफा भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण संदेश माना गया। यह उस दौर की प्रशासनिक नैतिकता का उदाहरण था जब बिना प्रत्यक्ष दोष सिद्ध हुए भी एक वरिष्ठ अधिकारी सुरक्षा विफलता की जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ देता था। आज भी इस घटना का उल्लेख जवाबदेही और नैतिक जिम्मेदारी के संदर्भ में किया जाता है।
इस जासूसी कांड में कई सरकारी अधिकारी, कारोबारी और विदेशी दूतावासों से जुड़े लोगों के नाम सामने आए। कुछ विदेशी राजनयिकों को भारत छोड़ने के लिए भी कहा गया। यह मामला सिर्फ जासूसी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने भारत की आंतरिक सुरक्षा प्रणाली की कमजोरियों को उजागर कर दिया। उस समय दुनिया शीत युद्ध के दौर से गुजर रही थी। अमेरिका और सोवियत संघ जैसे महाशक्तियों के बीच वैश्विक तनाव चरम पर था और भारत की रणनीतिक स्थिति बेहद महत्वपूर्ण थी। ऐसे समय में भारतीय रक्षा और विदेश नीति से जुड़ी सूचनाओं का बाहर जाना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा माना गया।
यह मामला भारतीय मीडिया में भी काफी चर्चित रहा। लोगों के मन में यह सवाल गूंजने लगा कि आखिर देश की सबसे सुरक्षित संस्थाओं में इतनी बड़ी सेंध कैसे लग गई। इस कांड ने यह भी दिखाया कि जासूसी सिर्फ सीमाओं पर नहीं होती। कई बार सबसे खतरनाक युद्ध फाइलों, दफ्तरों और भरोसे के भीतर लड़े जाते हैं।
आज “कूमर नारायण स्पाई कांड” भारतीय राजनीतिक इतिहास के सबसे चर्चित जासूसी मामलों में गिना जाता है। यह घटना याद दिलाती है कि सत्ता के सबसे मजबूत ढांचे भी अंदर से कमजोर हो सकते हैं। यह सिर्फ जासूसी की कहानी नहीं, बल्कि सत्ता, विश्वास और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच छिपे उस संघर्ष की कहानी है जो अक्सर आम जनता की नजरों से दूर रहता है।