आज क्रिकेट कमेंट्री हाईटेक स्टूडियो, दर्जनों कैमरों और विशेषज्ञ पैनलों के बीच होती है। दर्शक हर गेंद को अलग-अलग एंगल से देख सकते हैं। लेकिन एक समय ऐसा भी था जब भारत में करोड़ों लोग सिर्फ एक आवाज के सहारे मैच महसूस करते थे। वह आवाज थी — ए.एफ.एस. टाल्यारखान की। उन्हें भारतीय क्रिकेट कमेंट्री का पितामह कहा जाता है। उन्होंने उस दौर में क्रिकेट को लोगों तक पहुंचाया जब न टेलीविजन था, न इंटरनेट और न ही लाइव स्ट्रीमिंग। रेडियो ही लोगों की आंखें था और टाल्यारखान उसकी सबसे प्रभावशाली आवाज।
ए.एफ.एस. टाल्यारखान का पूरा नाम आर्देशिर फरामजी सोराबजी टाल्यारखान था। उनका जन्म 1897 में हुआ था और वह पारसी समुदाय से संबंध रखते थे। उनकी अंग्रेजी भाषा पर असाधारण पकड़ थी और उनकी आवाज में ऐसी गंभीरता और प्रभाव था कि लोग रेडियो के सामने बैठकर घंटों उन्हें सुनते रहते थे। उन्होंने 1930 के दशक में क्रिकेट कमेंट्री शुरू की, जब यह भारत में लगभग नया माध्यम था। कहा जाता है कि 1934 में उन्होंने बॉम्बे जिमखाना में पारसी और मुस्लिम टीमों के मैच की कमेंट्री की और यहीं से भारतीय क्रिकेट प्रसारण के एक नए युग की शुरुआत हुई।
टाल्यारखान की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वह अकेले पूरे मैच की कमेंट्री कर सकते थे। आज जहां कमेंट्री टीमों में कई लोग शामिल होते हैं, उस दौर में वह घंटों बिना रुके गेंद-दर-गेंद मैच का वर्णन करते थे। उनकी शैली इतनी जीवंत होती थी कि रेडियो सुनने वाला व्यक्ति खुद को मैदान में महसूस करने लगता था। वह सिर्फ यह नहीं बताते थे कि गेंद कहां गई, बल्कि वह पूरे वातावरण को शब्दों में बदल देते थे। दर्शक भीड़ का शोर, बल्लेबाज की घबराहट और गेंदबाज की रणनीति तक महसूस कर लेते थे।
उनकी कमेंट्री में एक तरह की नाटकीयता थी, लेकिन वह बनावटी नहीं लगती थी। वह क्रिकेट को सिर्फ खेल की तरह नहीं, बल्कि एक कहानी की तरह प्रस्तुत करते थे। यही कारण था कि उस दौर में जब क्रिकेट अभी भारत के गांवों और छोटे शहरों तक पूरी तरह नहीं पहुंचा था, तब टाल्यारखान की आवाज ने इसे जन-जन तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने क्रिकेट को एक सामूहिक अनुभव बना दिया।
टाल्यारखान सिर्फ कमेंटेटर नहीं थे, बल्कि खेल पत्रकार भी थे। उनका कॉलम “टेक इट फ्रॉम मी” काफी लोकप्रिय था। वह खेल जगत की राजनीति, चयन विवादों और प्रशासनिक समस्याओं पर खुलकर लिखते थे। उनकी लेखनी भी उतनी ही तीखी और प्रभावशाली थी जितनी उनकी आवाज। वह अपने विचारों को बेबाकी से रखने के लिए जाने जाते थे।
उनका व्यक्तित्व भी काफी अलग था। वह अपने काम को लेकर बेहद गंभीर और आत्मविश्वासी थे। कहा जाता है कि उन्हें माइक्रोफोन साझा करना पसंद नहीं था। 1948-49 में जब ऑल इंडिया रेडियो ने कमेंट्री के लिए कई लोगों की टीम बनाने का फैसला किया, तब उन्होंने इसका विरोध किया और अंततः AIR छोड़ दिया। यह घटना उनके स्वभाव को दर्शाती है। वह अपने काम की शैली से समझौता नहीं करना चाहते थे।
टाल्यारखान का प्रभाव सिर्फ क्रिकेट तक सीमित नहीं था। उन्होंने भारतीय प्रसारण की भाषा और शैली को भी प्रभावित किया। उनके शब्दों की गति, आवाज का उतार-चढ़ाव और खेल को कहानी की तरह प्रस्तुत करने की कला बाद की पीढ़ियों के कमेंटेटरों के लिए प्रेरणा बनी। आज भारतीय क्रिकेट कमेंट्री जिस ऊंचाई पर है, उसकी नींव कहीं न कहीं टाल्यारखान जैसे लोगों ने ही रखी थी।
दिलचस्प बात यह है कि उनका परिवार बाद में बॉलीवुड से भी जुड़ गया। उनकी बेटी गीतांजलि टाल्यारखान की शादी अभिनेता विनोद खन्ना से हुई थी और अभिनेता अक्षय खन्ना तथा राहुल खन्ना उनके नाती हैं। लेकिन इसके बावजूद ए.एफ.एस. टाल्यारखान का नाम आज नई पीढ़ी में उतना चर्चित नहीं है जितना होना चाहिए।
वास्तव में टाल्यारखान की कहानी सिर्फ एक कमेंटेटर की कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है जब लोग क्रिकेट को आंखों से कम और कल्पना से ज्यादा देखते थे। रेडियो के सामने बैठा श्रोता उनकी आवाज के जरिए पूरे मैदान की तस्वीर अपने मन में बनाता था। उन्होंने भारतीय क्रिकेट को सिर्फ सुनाया नहीं, बल्कि उसे महसूस करवाया। यही कारण है कि भारतीय क्रिकेट प्रसारण के इतिहास में उनका नाम हमेशा सबसे सम्मानित आवाजों में गिना जाएगा।