2006 का फुटबॉल विश्व कप इटली के लिए सिर्फ एक टूर्नामेंट नहीं था, बल्कि गौरव, अनुशासन और फुटबॉल की महान परंपरा का उत्सव था। बर्लिन के स्टेडियम में जब इटली ने फ्रांस को हराकर विश्व कप जीता, तब पूरी दुनिया ने माना कि अज्ज़ूरी यानी इटली की राष्ट्रीय टीम अब भी फुटबॉल की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। फाबियो कन्नावारो, आंद्रेया पिरलो, जियानलुइजी बफॉन, गट्टूसो और फ्रांसेस्को टोटी जैसे खिलाड़ी उस पीढ़ी का हिस्सा थे जिसे इटली के इतिहास की सबसे महान टीमों में गिना जाता है। लेकिन विडंबना यह रही कि यही जीत धीरे-धीरे इटली के पतन की शुरुआत भी बन गई।
विश्व कप जीत के समय ही इटैलियन फुटबॉल अंदर से संकट में था। 2006 में “काल्चियोपोली” नाम का बड़ा भ्रष्टाचार घोटाला सामने आया। इस घोटाले में रेफरी चयन और मैचों को प्रभावित करने के आरोप लगे। इटली के सबसे बड़े क्लब युवेंटस को दंडित किया गया और उसे निचली लीग में भेज दिया गया। कई अन्य क्लबों पर भी कार्रवाई हुई। हालांकि राष्ट्रीय टीम ने विश्व कप जीत लिया, लेकिन घरेलू फुटबॉल की साख और संरचना को भारी नुकसान पहुंच चुका था। यह ऐसा घाव था जिसने धीरे-धीरे इटली की फुटबॉल संस्कृति को कमजोर करना शुरू कर दिया।
इसी दौरान दुनिया का फुटबॉल तेजी से बदल रहा था। स्पेन ने टिक-टाका और पजेशन फुटबॉल को नई ऊंचाई दी। जर्मनी ने युवा खिलाड़ियों के विकास पर ध्यान देकर आधुनिक और तेज फुटबॉल तैयार किया। इंग्लैंड की प्रीमियर लीग आर्थिक रूप से दुनिया की सबसे ताकतवर लीग बनती जा रही थी। लेकिन इटली लंबे समय तक अपनी पुरानी शैली में फंसा रहा। “कैटेनाचियो” यानी मजबूत रक्षा आधारित फुटबॉल कभी इटली की पहचान था, लेकिन आधुनिक फुटबॉल अब सिर्फ बचाव से नहीं जीता जा सकता था। गति, फिटनेस, तकनीक और आक्रामकता नई जरूरत बन चुकी थी।
2006 के बाद इटली की टीम धीरे-धीरे बूढ़ी होती गई। नई पीढ़ी उतनी मजबूत नहीं दिख रही थी। 2010 विश्व कप में इटली ग्रुप स्टेज से बाहर हो गया। यह एक चौंकाने वाला परिणाम था क्योंकि वह गत विजेता था। लेकिन लोगों ने इसे एक खराब टूर्नामेंट मानकर नजरअंदाज कर दिया। फिर 2014 विश्व कप में भी वही कहानी दोहराई गई। इटली फिर शुरुआती दौर में ही बाहर हो गया। अब यह स्पष्ट हो चुका था कि समस्या अस्थायी नहीं, बल्कि गहरी थी।
सबसे बड़ा झटका 2018 में लगा जब इटली विश्व कप के लिए क्वालीफाई ही नहीं कर पाया। लगभग 60 साल बाद ऐसा हुआ था कि इटली विश्व कप में मौजूद नहीं था। पूरी दुनिया हैरान थी। कैमरों के सामने जियानलुइजी बफॉन की आंखों में आंसू थे। वह सिर्फ एक खिलाड़ी की विदाई नहीं थी, बल्कि इटली के फुटबॉल गौरव के टूटने का प्रतीक बन चुकी थी। जिस देश ने चार विश्व कप जीते थे, वही अब विश्व कप देखने के लिए दर्शक बन गया था।
इटली की घरेलू लीग सेरी ए का पतन भी इस संकट का बड़ा कारण बना। एक समय था जब एसी मिलान, इंटर मिलान और युवेंटस जैसे क्लब दुनिया के सबसे बड़े क्लब माने जाते थे। दुनिया के महान खिलाड़ी इटली में खेलना चाहते थे। लेकिन धीरे-धीरे आर्थिक ताकत इंग्लैंड और स्पेन की ओर चली गई। इटली के स्टेडियम पुराने हो गए, निवेश कम होता गया और क्लब आधुनिक फुटबॉल की व्यावसायिक दौड़ में पीछे छूटने लगे। युवा खिलाड़ी भी अन्य लीगों की ओर आकर्षित होने लगे।
हालांकि इटली पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। 2021 में यूरो कप जीतकर उसने फिर दुनिया को चौंका दिया। रोबर्टो मैनचिनी की टीम ने तेज और आक्रामक फुटबॉल खेला। यह वही इटली नहीं था जो सिर्फ बचाव के लिए जाना जाता था। लेकिन विडंबना देखिए कि यूरो जीतने के बावजूद इटली 2022 विश्व कप के लिए फिर क्वालीफाई नहीं कर पाया। इससे यह स्पष्ट हो गया कि समस्या अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
अज्ज़ूरी की कहानी सिर्फ फुटबॉल की कहानी नहीं है। यह उस सच्चाई की कहानी है कि कोई भी महान शक्ति सिर्फ अपने इतिहास के सहारे हमेशा जीवित नहीं रह सकती। बदलाव के साथ खुद को बदलना जरूरी होता है। 2006 में इटली फुटबॉल की दुनिया का राजा था, लेकिन उसी समय उसके पतन के बीज भी बोए जा चुके थे। फिर भी इटली की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह कभी पूरी तरह खत्म नहीं होता। हर गिरावट के बाद वहां एक नई पीढ़ी जन्म लेती है जो फिर से उस नीली जर्सी को महान बनाने का सपना देखती है।