विक्रमशिला सेतु का टूटना सिर्फ एक इंफ्रास्ट्रक्चर फेल्योर नहीं है—
यह सिस्टम की कमजोरियों का आईना है। स्थानीय लोग पहले से चेतावनी दे रहे थे इंजीनियरों के बयान और हकीकत में अंतर था और अंत में, नुकसान आम जनता को झेलना पड़ा।
बिहार के भागलपुर में गंगा नदी पर बना विक्रमशिला सेतु सिर्फ एक पुल नहीं था, बल्कि लाखों लोगों की जीवनरेखा था। 2001 में बना यह लगभग 4.4 – 4.7 किमी लंबा पुल उत्तर और दक्षिण बिहार को जोड़ता था।
लेकिन मई 2026 में इसका एक हिस्सा अचानक गिर गया—और इसके साथ ही लोगों का भरोसा भी हिल गया।
स्थानीय लोगों की राय (ग्राउंड रियालिटी)
हादसे के बाद सबसे ज्यादा असर आम लोगों पर पड़ा।
लोग क्या कह रहे हैं?
“हम सालों से पुल की खराब हालत की शिकायत कर रहे थे, लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया।”
“अब हमें 100 किमी लंबा रास्ता लेना पड़ रहा है।”
“नाव से जाना पड़ रहा है, लेकिन वहां भी भीड़ और अव्यवस्था है।”
सच यह है कि पुल बंद होने के बाद लोग नावों के भरोसे यात्रा कर रहे हैं घंटों इंतजार करना पड़ रहा है रोज़गार, पढ़ाई और इलाज सब प्रभावित हो रहे हैंस्थानीय लोगों के लिए यह सिर्फ एक पुल नहीं, बल्कि जीवन का जरूरी हिस्सा था।
क्या यह सिर्फ एक हादसा था या लंबे समय से चली आ रही लापरवाही का नतीजा?
इस घटना को समझने के लिए तीन बड़े कारण सामने आते हैं:
1. रखरखाव की कमी , 2. ओवरलोडिंग , 3. प्रशासनिक लापरवाही
पुल की नियमित जांच और मरम्मत समय पर नहीं हुई। जितनी क्षमता थी, उससे ज्यादा ट्रैफिक लगातार चला। स्थानीय चेतावनियों को नजरअंदाज किया गया।