1972 का म्यूनिख ओलंपिक दुनिया के लिए खेल, शांति और अंतरराष्ट्रीय एकता का प्रतीक माना जा रहा था। लेकिन अचानक गोलियों की आवाज ने इस उत्सव को भय और रक्तपात में बदल दिया। फ़िलिस्तीनी उग्रवादी संगठन “ब्लैक सितंबर” ने इज़राइली खिलाड़ियों को बंधक बना लिया। जर्मन सुरक्षा एजेंसियों का रेस्क्यू ऑपरेशन विफल रहा और अंततः 11 इज़राइली खिलाड़ियों की मौत हो गई। यह घटना सिर्फ एक आतंकी हमला नहीं थी, बल्कि इज़राइल की राष्ट्रीय चेतना पर गहरा घाव थी। पूरे देश में गुस्सा, दुख और प्रतिशोध की भावना फैल गई। इसी घटना के बाद इज़राइल ने एक गुप्त मिशन शुरू किया, जिसे बाद में “ऑपरेशन रॉथ ऑफ गॉड” के नाम से जाना गया।
उस समय इज़राइल की प्रधानमंत्री गोल्डा मेयर थीं। उन पर देश के भीतर भारी दबाव था कि म्यूनिख हमले के जिम्मेदार लोगों को सजा दी जाए। लेकिन समस्या यह थी कि हमलावर किसी एक देश में नहीं थे। वे अलग-अलग देशों में छिपे हुए थे और कई नकली पहचानों के साथ रह रहे थे। ऐसे में पारंपरिक युद्ध संभव नहीं था। तब इज़राइल की खुफिया एजेंसी मोसाद को जिम्मेदारी दी गई कि वह दुनिया भर में उन लोगों को खोजे और खत्म करे जिन्हें म्यूनिख नरसंहार की योजना और समर्थन से जोड़ा गया था।
यहीं से शुरू हुआ आधुनिक इतिहास के सबसे चर्चित कोवर्ट ऑपरेशन में से एक। मोसाद एजेंट नकली पासपोर्ट, बदली हुई पहचान और गुप्त नेटवर्क के जरिए यूरोप, मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में सक्रिय हुए। यह युद्ध सीमाओं पर नहीं लड़ा जा रहा था। यह होटलों, कैफे, अपार्टमेंट्स और सुनसान गलियों में चल रहा था। लक्ष्य थे ब्लैक सितंबर और फिलिस्तीनी संगठनों से जुड़े वे लोग जिन्हें इज़राइल हमले का जिम्मेदार मानता था।
कई अभियानों में बमों का इस्तेमाल किया गया। कहीं होटल के कमरों में विस्फोटक लगाए गए, कहीं कारों में बम फिट किए गए और कहीं सड़क पर गोलियां चलाई गईं। मोसाद की रणनीति साफ थी — दुनिया के किसी भी कोने में छिपे दुश्मन को यह संदेश देना कि इज़राइल अपने नागरिकों के खून का बदला लेने के लिए कहीं भी पहुंच सकता है। इस अभियान ने दुनिया को यह दिखाया कि आधुनिक खुफिया एजेंसियां किस स्तर तक जाकर कार्रवाई कर सकती हैं।
लेकिन इस ऑपरेशन के साथ नैतिक और कानूनी सवाल भी जुड़े। इज़राइल के भीतर कई लोगों ने इसे न्याय माना। उनके लिए यह उन निर्दोष खिलाड़ियों के लिए प्रतिशोध था जिन्हें ओलंपिक जैसे मंच पर मार दिया गया था। लेकिन आलोचकों ने इसे “राज्य प्रायोजित हत्या” कहा। उनका तर्क था कि बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के हत्या करना अंतरराष्ट्रीय कानून और नैतिकता दोनों के खिलाफ है।
इस अभियान की सबसे विवादास्पद घटना 1973 में नॉर्वे के शहर लिलेहैमर में हुई। मोसाद एजेंटों ने एक मोरक्कन वेटर अहमद बुचिकी को गलती से आतंकवादी समझकर मार दिया। बाद में पता चला कि वह निर्दोष था। इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ा विवाद खड़ा कर दिया। कई मोसाद एजेंट गिरफ्तार किए गए और इज़राइल की आलोचना हुई। इस घटना ने दिखाया कि प्रतिशोध की राजनीति में एक गलती भी कितनी भयावह हो सकती है।
“ऑपरेशन रॉथ ऑफ गॉड” बाद में सिनेमा और लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा भी बन गया। स्टीवन स्पीलबर्ग की फिल्म “म्यूनिख” ने इस पूरे अभियान को नए दृष्टिकोण से दुनिया के सामने रखा। फिल्म सिर्फ जासूसी और हत्या की कहानी नहीं थी, बल्कि यह सवाल उठाती थी कि क्या बदला कभी सच में शांति दे सकता है। क्या हिंसा से न्याय पैदा होता है या फिर वह सिर्फ हिंसा का नया चक्र शुरू करती है?
यह ऑपरेशन आधुनिक खुफिया युद्ध की पहचान बन चुका है। टारगेटेड ऐसासिनेशन , सर्विलांस नेटवर्क और साइकोलॉजिल वारफेयर जैसी अवधारणाओं को इस अभियान ने वैश्विक स्तर पर चर्चित बना दिया। आज भी दुनिया की कई खुफिया एजेंसियां इस मिशन का अध्ययन करती हैं। लेकिन इसकी विरासत सिर्फ रणनीतिक नहीं है। यह नैतिक बहस का विषय भी है।
ऑपरेशन रॉथ ऑफ गॉड की कहानी हमें याद दिलाती है कि आतंकवाद और प्रतिशोध के बीच की रेखा कई बार धुंधली हो जाती है। जब राष्ट्र बदला लेने निकलते हैं, तब युद्ध सिर्फ दुश्मनों को नहीं बदलता, बल्कि इंसानी नैतिकता और राजनीति की सीमाओं को भी बदल देता है।