विशेष संपादकीय: पत्रकारिता समाज का चौथा स्तंभ है और यह समाज का आईना होती है- यह वह घिसा-पिटा जुमला है जिसे हम बचपन से सुनते आ रहे हैं। लोग बड़े गर्व से कहते हैं कि समाज में जो कुछ भी घटित होता है, पत्रकारिता उसे बिना किसी मिलावट के हूबहू दिखा देती है। लेकिन आज के दौर की कड़वी सच्चाई यह है कि दूसरों को उनका चेहरा दिखाने वाली पत्रकारिता के पास आज खुद का कोई आईना नहीं बचा है। जो मीडिया दूसरों की कमियां ढूंढने में दिन-रात एक कर देता है, वह अपनी खुद की धुंधली होती जा रही छवि को देखने और समझने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा है।
जब आईना ही ‘सिलेक्टिव’ हो जाए
आज पत्रकारिता पर यह आरोप सबसे गंभीर है कि उसके आईने पर ‘सुविधा’ और ‘समझौते’ की धूल जम चुकी है। जब समाज का यह तथाकथित आईना किसी एक पक्ष को चमकाकर दिखाने लगे और दूसरे पक्ष की बुनियादी समस्याओं को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दे, तो समझ जाना चाहिए कि आईने की अपनी कमान अब उसके हाथ में नहीं है। देश और समाज के बुनियादी मुद्दे जैसे बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और किसानों की बदहाली को टीआरपी (TRP) की दौड़ में पीछे धकेल दिया गया है। दूसरों से जवाबदेही (Accountability) मांगने वाले पत्रकार आज खुद से यह सवाल पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पाते कि वे जो परोस रहे हैं, क्या वह वाकई पत्रकारिता है या सिर्फ एक खास एजेंडे का हिस्सा?
अंतरात्मा की आवाज खो चुकी है आज की पत्रकारिता
सबसे बड़ा सवाल: “जो कलम दूसरों के भ्रष्टाचार और गलतियों पर बेबाकी से चलती है, वह अपनी ही बिरादरी की कमियों और गिरते नैतिक स्तर पर चुप क्यों हो जाती है?”
आज पत्रकारों के पास खुद का आईना इसलिए भी नहीं है क्योंकि आत्म-मंथन (Self-Reflection) की परंपरा लगभग खत्म हो चुकी है। पत्रकारिता में अब ‘सत्य’ से ज्यादा ‘स्पीड’ और ‘सनसनी’ को महत्व दिया जा रहा है। फेक न्यूज़, आधी-अधूरी जानकारियां और किसी के चरित्र हनन (Character Assassination) को ब्रेकिंग न्यूज़ बनाकर पेश करना आज आम बात हो गई है। जब तक पत्रकारिता अपनी खुद की आंतरिक कमियों को देखने के लिए एक ‘नैतिक आईना’ अपने सामने नहीं रखेगी, तब तक वह समाज का विश्वास वापस नहीं जीत पाएगी।
विश्वसनीयता का संकट: साख बचाने के लिए खुद को देखना होगा
अगर पत्रकारिता को लोकतंत्र का प्रहरी बने रहना है, तो सबसे पहले उसे आत्मनिरीक्षण (Introspection) करना होगा। पत्रकारों को उस आईने की सख्त जरूरत है जो उन्हें यह याद दिला सके कि उनकी ताकत किसी राजनीतिक दल या कॉर्पोरेट घराने से नहीं, बल्कि आम जनता के भरोसे से आती है। जब तक मीडिया अपनी खुद की तटस्थता और ईमानदारी का मूल्यांकन करने के लिए तैयार नहीं होगा, तब तक समाज का यह आईना सिर्फ एकतरफा और धुंधला ही नजर आएगा। अब समय आ गया है कि दूसरों की कमियां उजागर करने वाली यह बिरादरी एक बार ठहरकर खुद के भीतर झांके और अपनी खोई हुई साख को वापस पाने की लड़ाई लड़े।