270 साल पुरानी ‘पूरबिया’ वीरता की कहानी, जिसने गलवान से कारगिल तक हर युद्ध में दिखाया दम
पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में 14 और 15 जून 2020 की वह रात भारतीय सैन्य इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो चुकी है। बर्फ से ढकी ऊंची पहाड़ियां, शून्य से नीचे तापमान, अंधेरा और मौत जैसी खामोशी… लेकिन इसी खामोशी को चीरते हुए भारतीय सैनिकों ने ऐसा साहस दिखाया, जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया।
लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर भारतीय सेना और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक संघर्ष छिड़ गया था। दुश्मन संख्या में ज्यादा था, हथियार भी घातक थे, लेकिन भारतीय जवानों ने पीछे हटने से इनकार कर दिया। इस लड़ाई के केंद्र में थे 16वीं बिहार रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल बिकुमल्ला संतोष बाबू, जिन्होंने अपने जवानों के साथ आखिरी सांस तक मोर्चा संभाले रखा।
गलवान की वह रात… जब मौत के सामने भी नहीं झुके ‘बिहारी मस्कटियर्स’
आधिकारिक प्रशस्ति पत्र के अनुसार, चीनी सैनिकों ने घातक हथियारों और भारी पथराव के साथ हमला शुरू किया। हालात बेहद हिंसक थे, लेकिन कर्नल संतोष बाबू और उनके जवान चट्टान की तरह डटे रहे।
दुश्मनों को पीछे धकेलने के बाद जब भारतीय प्लाटून बंकरों की सफाई कर रही थी, उसी दौरान कर्नल बाबू ने दो चीनी सैनिकों को मार गिराया और एक मशीन गन को खामोश कर दिया। भीषण गोलीबारी में उनके बाएं हाथ में गोलियां लगीं, लेकिन वे रुके नहीं। घायल होने के बावजूद उन्होंने एक बंकर में दो हथगोले फेंककर एक और दुश्मन सैनिक को ढेर कर दिया।
इसी बीच रॉकेट प्रोपेल्ड ग्रेनेड के हमले में वे गंभीर रूप से घायल हो गए और मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी वीरता और नेतृत्व क्षमता के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत “महावीर चक्र” से सम्मानित किया। यह सम्मान सिर्फ एक सैनिक को नहीं, बल्कि उस परंपरा को मिला था जिसने सदियों से रणभूमि में अपना लोहा मनवाया है।
आखिर कहां से शुरू होती है इन अजेय योद्धाओं की कहानी?
मौजूदा स्वरूप में बिहार रेजिमेंट का गठन 1941 में हुआ था, लेकिन इसकी सैन्य विरासत लगभग 270 साल पुरानी मानी जाती है। इसकी जड़ें 1757 में पटना में स्थापित 34वीं सिपाही बटालियन से जुड़ी हैं, जिसे बंगाल प्रेसीडेंसी के पहले ब्रिटिश गवर्नर लॉर्ड रॉबर्ट क्लाइव ने तैयार किया था।
शुरुआती दौर में इस बटालियन में बिहार के भोजपुर क्षेत्र के जवानों की भर्ती की जाती थी। बाद में इसका विस्तार पूरे शाहाबाद इलाके तक हुआ, जिसमें आज के भोजपुर, बक्सर, रोहतास और कैमूर जिले शामिल हैं। इन जवानों की युद्ध क्षमता इतनी जबरदस्त थी कि तत्कालीन शासक मीर कासिम भी उनसे प्रभावित हो गए थे। उन्होंने पश्चिमी युद्ध तकनीक से प्रशिक्षित सैन्य इकाइयां बनानी शुरू कर दी थीं।
‘पूरबिया’ जवान… जिनसे अंग्रेज भी कांपते थे
गंगा के पूर्वी मैदानी इलाकों से आने वाले इन सैनिकों को “पूरबिया” कहा जाने लगा। अनुशासन, आक्रामक युद्ध शैली और अचूक निशानेबाजी के कारण ये सैनिक जल्द ही अंग्रेजों की बंगाल इन्फैंट्री की रीढ़ बन गए। इतिहासकारों के अनुसार, समय के साथ ये सैनिक “बिहारी मस्कटियर्स” के नाम से प्रसिद्ध हुए।
आग्नेयास्त्र चलाने में उनकी दक्षता इतनी शानदार थी कि कई भारतीय रियासतों के शासक उन्हें अपनी सेना में शामिल करने के लिए उत्सुक रहते थे। ये सैनिक युद्ध के मैदान में नई रणनीतियों को पल भर में सीख लेते थे और दुश्मनों पर भारी पड़ते थे।
1857 की क्रांति में भी बिहार ने फूंका था बिगुल
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भी बिहार और अवध क्षेत्र के सैनिकों ने निर्णायक भूमिका निभाई थी। मार्च 1857 में बैरकपुर में 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के सिपाही मंगल पांडेय ने अंग्रेज अधिकारियों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका। इसके बाद मेरठ से उठी क्रांति की चिंगारी पूरे देश में फैल गई।
इस विद्रोह ने अंग्रेजों को इतना डरा दिया कि उन्होंने लंबे समय तक बिहारी युवाओं की सेना में भर्ती पर लगभग अघोषित रोक लगा दी थी।
दूसरे विश्व युद्ध से शुरू हुई नई पहचान
लंबे अंतराल के बाद 1941 में बिहार रेजिमेंट को औपचारिक रूप से स्थापित किया गया। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बर्मा अभियान में इस रेजिमेंट ने असाधारण बहादुरी दिखाई। अक्टूबर 1944 में हाका और जनवरी 1945 में गंगॉ पर कब्जा कर बिहार रेजिमेंट ने अपनी युद्ध क्षमता साबित कर दी।
इन अभियानों के लिए रेजिमेंट को “हाका” और “गंगॉ” बैटल ऑनर के साथ “थिएटर ऑनर बर्मा” से सम्मानित किया गया।
कारगिल से लेकर UN मिशन तक… हर मोर्चे पर पराक्रम
आजादी के बाद बिहार रेजिमेंट ने हर बड़े सैन्य अभियान में हिस्सा लिया। 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध, कारगिल युद्ध, श्रीलंका मिशन, ऑपरेशन मेघदूत और संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में इस रेजिमेंट ने अपना परचम लहराया।
कारगिल युद्ध के दौरान दुर्गम पहाड़ियों पर बिहार रेजिमेंट के जवानों ने जिस साहस का परिचय दिया, उसने दुश्मनों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
क्यों अलग है बिहार रेजिमेंट?
आज बिहार रेजिमेंट भारतीय सेना की सबसे अनुशासित और आक्रामक इन्फैंट्री यूनिट्स में गिनी जाती है। इसके पास 20 नियमित बटालियन, चार राष्ट्रीय राइफल्स बटालियन और दो टेरिटोरियल आर्मी बटालियन हैं। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के हजारों जवान इसमें सेवा दे रहे हैं।
इस रेजिमेंट को अब तक चार अशोक चक्र और तीन महावीर चक्र सहित कई वीरता पुरस्कार मिल चुके हैं। इसका युद्ध घोष “जय बजरंग बली” रणभूमि में जवानों का जोश बढ़ाने का प्रतीक माना जाता है।
सिर्फ रेजिमेंट नहीं, भारतीय शौर्य की पहचान
गलवान घाटी से लेकर कारगिल तक बिहार रेजिमेंट ने हर बार साबित किया है कि भारतीय सेना की सबसे बड़ी ताकत उसके जवानों का साहस, अनुशासन और मातृभूमि के प्रति समर्पण है।
यही वजह है कि आज भी जब बिहार रेजिमेंट का नाम लिया जाता है, तो दुश्मनों के मन में डर और भारतीयों के दिल में गर्व पैदा हो जाता है।
